जिला रेडक्रॉस सोसायटी द्वारा हर घर तिरंगा अभियान के तहत निकाली गई साइकिल रैली

हनुमान चालीसा पाठ से होने वाले लाभ

सम्पूर्ण हनुमान चालीसा के पाठ में हनुमान जी की शक्तियों का वर्णन किया गया है |

इस पाठ के माध्यम से ही हम हनुमान जी की आराधना करने के साथ-साथ उन्हें उनकी शक्तियों का भी स्मरण कराते है जिससे वे शीघ्र प्रसन्न होकर हमें फलीभूत करते है |

कष्टों से छुटकारा दिलाते हैं

हनुमान चालीसा का पाठ प्रतिदिन करना चाहिए |

इसलिए जितना शीघ्र हो सके आप इसे याद कर ले |

सुबह का एक समय निश्चित कर प्रतिदिन उसी समय पर हनुमान चालीसा का पाठ करे |

सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र पहन लें.

– अपना मुंह पूर्व दिशा में या दक्षिण दिशा में रखकर लाल आसन पर बैठें.

– हनुमान जी की फोटो को पूर्व या दक्षिण दिशा में लाल वस्त्र बिछाकर रखें.

– गाय के घी या तिल के तेल का दिया जलाएं और एक लोटे में जल भरकर रखें और हनुमान जी के सामने 3 बार हनुमान चालीसा का पाठ करें.

– गुड़ या बूंदी के लड्डू का भोग लगाएं.

– ऐसा लगातार 11 मंगलवार करने से हनुमान जी की कृपा प्राप्त होती है.

हनुमान जी के ऐसे मंदिर जहाँ हनुमान जी को चौला चढ़ाया जाता हो, उस मंदिर में जाकर हनुमान जी के चरणों से थोड़ा सा सिन्दूर एक डिब्बी में घर ले आये अब डिब्बी में और सिन्दूर व थोडा चमेली का तेल मिलाकर रखे ले

रोजाना पूजा पर बैठते समय सबसे पहले हनुमान जी का ध्यान करते हुए इस सिन्दूर से स्वयं को तिलक करे |

लाल या पीले वस्त्र धारण कर लाल ऊनी आसन बिछाकर हनुमान जी की प्रतिमा के सामने बैठ जाये साथ में एक लौटे में जल और प्रसाद रूप में कुछ मीठा रखे |

अब चमेली के तेल का दीपक प्रज्वल्लित करे |

पानी के लौटे को हनुमान जी की प्रतिमा के सम्मुख रखकर आदरपूर्वक उन्हें ग्रहण करने को कहे |

अब थोड़े मीठे को भोग स्वरुप उनकी प्रतिमा के आगे रखे

किसी भी घोर संकट से निकलने के लिए हनुमान चालीसा का पाठ करना फलदायी माना गया है | इसके अतिरिक्त मनोकामना पूर्ति हेतु व भविष्य को सुरक्षित बनाने हेतु भी हनुमान चालीसा का पाठ किया जाता है |

हनुमान चालीसा

दोहा : श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।

बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।। 

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।

बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।। 

चौपाई : जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।जय कपीस तिहुं लोक उजागर।। 

रामदूत अतुलित बल धामा।अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।। 

महाबीर बिक्रम बजरंगी।कुमति निवार सुमति के संगी।। 

कंचन बरन बिराज सुबेसा।कानन कुंडल कुंचित केसा।। 

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।कांधे मूंज जनेऊ साजै। 

संकर सुवन केसरीनंदन।तेज प्रताप महा जग बन्दन।। 

विद्यावान गुनी अति चातुर।राम काज करिबे को आतुर।। 

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।राम लखन सीता मन बसिया।। 

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।बिकट रूप धरि लंक जरावा।। 

भीम रूप धरि असुर संहारे।रामचंद्र के काज संवारे।।

 लाय सजीवन लखन जियाये।श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।। 

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।। 

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।। 

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।नारद सारद सहित अहीसा।। 

जम कुबेर दिगपाल जहां ते।कबि कोबिद कहि सके कहां ते।। 

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।राम मिलाय राज पद दीन्हा।। 

तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।लंकेस्वर भए सब जग जाना।। 

जुग सहस्र जोजन पर भानू।लील्यो ताहि मधुर फल जानू।। 

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।।

दुर्गम काज जगत के जेते।सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।। 

राम दुआरे तुम रखवारे।होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।

सब सुख लहै तुम्हारी सरना।तुम रक्षक काहू को डर ना।। 

आपन तेज सम्हारो आपै।तीनों लोक हांक तें कांपै।। 

भूत पिसाच निकट नहिं आवै।महाबीर जब नाम सुनावै।। 

नासै रोग हरै सब पीरा।जपत निरंतर हनुमत बीरा।।

 संकट तें हनुमान छुड़ावै।मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।

 सब पर राम तपस्वी राजा।तिन के काज सकल तुम साजा।

और मनोरथ जो कोई लावै।सोइ अमित जीवन फल पावै।। 

चारों जुग परताप तुम्हारा।है परसिद्ध जगत उजियारा।।

 साधु-संत के तुम रखवारे।असुर निकंदन राम दुलारे।।

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।अस बर दीन जानकी माता।। 

राम रसायन तुम्हरे पासा।सदा रहो रघुपति के दासा।। 

तुम्हरे भजन राम को पावै।जनम-जनम के दुख बिसरावै।। 

अन्तकाल रघुबर पुर जाई।जहां जन्म हरि-भक्त कहाई।। 

और देवता चित्त न धरई।हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।। 

संकट कटै मिटै सब पीरा।जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।। 

जै जै जै हनुमान गोसाईं।कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।। 

जो सत बार पाठ कर कोई।छूटहि बंदि महा सुख होई।। 

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।होय सिद्धि साखी गौरीसा।। 

तुलसीदास सदा हरि चेरा।कीजै नाथ हृदय मंह डेरा।।  

दोहा :पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।

राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।


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